तो.. आज लग जाये एक शर्त ?
Nov 13th
आज कुछ ज़्यादा लिख कर तुम्हें परेशान नहीं करूँगा । भई, आज तो बाल-दिवस है, बोले तो हैप्पी चिल्ड्रेन्स डे ! बोलो है ना, क्योंकि तुम्हारे स्कूलों में आज खूब गाने वाने, डाँस, फ़ैन्सी ड्रेस वगैरह हुआ होगा ? तुम सबने हुल्लड़ मस्ती और चुटकुलों के चटकारे लिये होंगे । आज तो ढेर सारी शुभकामनायें मिल रहीं होंगी । अब अगर मैं अचपन जी, तुम्हें शुभकामना न भेजूँ, यह बड़ी गड़बड़ बात हो जायेगी । लेकिन मैं कुछ कँज़ूस और थोड़ा थोड़ा लालची भी हूँ । बूझो कैसे ? वह ऎसे कि मुझे अपनी शुभकामनाओं के बदले अपना मनपसँद रिटर्न-गिफ़्ट चाहिये होता है । तो..आज लग जाये एक शर्त, कि मुझे मेरा रिटर्न-गिफ़्ट तुम सब बड़े होकर ज़रूर दोगे ? जी हाँ, आपको भारत का गौरव बन कर पूरी दुनिया को दिखाना है ! तब तो आपकी वज़ह से आपके मम्मी, पापा और अचपन जी भी फ़ेमस हो जायेंगे अगली बार मैं बताऊँगा कि, मैं सोन-पापड़ी, पतीसा क्यों नहीं खाता । एनी गेस ? अब तुम दिमाग लगाओ, मैं तो चला.. मेरे बहुत सारे काम पेन्डिंग पड़े हैं । तो.. तुम सबको हैप्पी चिल्ड्रेन्स डे और अचपन जी का जय हिन्द !
Technorati Tags: Childrens Day,14th November,Chacha Nehru,achpan pachpan bachpan More >पिंगपिंग की अनोखी सहेली
Sep 6th
हुआ यह कि एक दिन जया की शैतानियों पर मुझे प्यार आ गया, ” देखो तो छटँकी कैसी हरकतें कर रही है ? ” निखिल को मौज़ आ गयी, ” छटँकी क्यों कहा, अँकल ?” मैं उनको इस विषय पर शह नहीं देना चाहता था, सो टाल गया, ” देखो फ़िफ़्थ में पहुँच गयी, और अभी भी इत्ती सी है !” लेकिन आज उसका जैसे दिन ही ख़राब था । जिसको कि तुम बच्चा-पार्टी कहते हो कि, ” आज तो मेरा लक ही ख़राब है । ” मैंने चिढ़ाया ! यह सुनते ही परम विद्वान, महाज्ञानी चुगलखोर महाराज श्री वैभव जी तुरँत लपक पड़े,
” औः और.. और क्या, ठीक तो कहते हैं, अचपन जी । लक वक कुच्छ नहीं होता है । मम्मी दूध का गिलास लिये इसके पीछे पीछॆ घूमती रहती हैं, तब जाकर यह दूध पीती है । औः औह… उसमें से भी इत्ता सारा दूध मेरे गिलास में डाल देती है । ” मैंनें अपना ढेर सारा मुँह लटका कर कहा, ” यह गलत बात है, जया । इससे तो तुम इत्ती की इत्ती रह जाओगी । ताकत के किये और बढ़ने के लिये तो यह सब ज़रूरी है, न भाई ? ” अब तो वैभव गुरु More >
काल-कलौटी..
Jul 1st
" निखिल भैआ, आ गये अचपन जी ? " कुछ सुनी-सुनी सी आवाज है, मैं सतर्क होता हूँ ।
दुबारा से " निखिल भैआ, आ गये अचपन जी ? " एक बार फिर दोहराया गया । अरे, ये तो अपना वैभव है, बहुत दिन बाद इनकी आवाज़ सुन रहा हूं । " नहीं बेटा, देखो शायद आज रात तक आ जाये । " बेचारे निराश हो गये, बोले तो कुछ भी नहीं, लेकिन बड़ी अदा से अपने दोनों कंधें नीचे झुका कर झटके,और बेचारगी से हल्की बारिश से गीली हो गई अपनी कामचलताऊ क्रिकेट पिच को देखते रहे । मुझे कौतुक हुआ," क्या बोर हो रहे हो ?" ज़नाब जोधा के अकबर भाई जूनियर ऋतिक रोशन जी ने एक लम्बाऽऽ सा आलाप लिया, " हां ऽऽऽ, हो तो रहे हैं । "
फिर खिसियाहट में पलट कर गुस्से से बोले, " .. और हाप्प भी.. हापने भी तो, " फिर ढेर सारा थूक गटक कर पूरी सावधानी बरतते हुए उल्टे अपना आरोप जड़ डाला, " आपने भी तो इत्ते दिन से कुछ भी मजा नहीं लगाया ! "
जया ने कुछ मान से पीछे से पुकारा, " बउआ आओ चलें.. कोई फायदा थोड़े ही ना है, यह तो जबरदस्ती से हमारे मैच में थर्ड अम्पायर More >
पहली डिज़िटल घड़ी
Jan 3rd
आज 3 जनवरी है… कोई नई बात… नहीं ?
रुको जरा, मैं बताता हूँ । यह जो तुम अपने ड्राइंग-रूम में टँगी हुई घड़ी देख रहे हो.. और तन्मय जी, अपने हाथ पर बाँधें घूम रहे हैं…. यह डिज़िटल घड़ी आज के ही दिन लांच हुई थी ! यह जानकारी मुझको रिशी जी ने अभी अभी दी है ! मैंनें तो सोचा, कि यह हाँक रहें हैं.. फिर नेट पर देखा तो यह सच ही बोल रहे हैं ! हुआ यह कि..
पुराने दौर में मैनुयल घड़ी को चालू रखने व सही समय देखने के लिये चौबीस घंटे में एक बार चाभी भरना बहुत ही ज़रूरी रहता था । इन घड़ियों की सबसे बड़ी प्रोब्लेम यह थी कि तुम एक बार भी चाभी भरना भूले नहीं कि तुम्हारा टाइम मैनेज़मेन्ट गड़बड़ाना तय !
इस समस्या का समाधान किया हैमिल्टन इलेक्ट्रिक आब्सोलेट नाम के कम्पनी ने । इसी कम्पनी ने दुनिया की पहली इलेक्ट्रानिक घड़ी लांच की थी । पता है.. बैटरी से चलने वाली इस घड़ी को बनाने में पूरे दस साल लग गये थे । इसे बनाने के प्रयास 1946 में शुरू कर दिया गया था, पर यह लांच हो पायी 3 जनवरी 1957 को । हैमिल्टन की यह घड़ी आधुनिकता More >
सचिन के सैकड़े
Jun 26th
थोड़ी मस्ती हो जाये ? ठीक, तो सचिन बास कैसे रहेंगे आज के लिये ? एग्रीड ? लेकिन मुझे तो क्लिनिक जाने की देर हो रही है । आज चलो एक छोटा सा मज़ा करते हैं, टूनडून से । थोड़ा कोशिश करोगे तो तुम भी कर पाओगे । देखो, है ना मज़ेदार !
देखने में यदि कोई अड़चन हो तो, मैक्रोमीडिया फ़्लैशप्लेयर डाउनलोड करके इंस्टाल कर लेना । अब तो ठीक है ! चाहो तो तुम भी बना सकते हो, लेकिन भाई पहले अपना होमवर्क ख़तम कर लो, खाना खा लो उसके बाद ही, ओक्के ? आल द बेस्ट !
Technorati Tags: टूनडून्स,toondoons,सचिन,सैकड़ा,toondoo.com,मस्तीयह दिल क्यों माँगे मोर ?
Jun 21st
हद हो गयी, मैंने बोला नहीं कि सभी जन समझ गये कि बात कोल्ड ड्रिंक की हो रही है ! तुमलोग तो बहुत ही इन्टेलिज़ेंट हो । चलो अच्छा है, मुझको अपनी बात ज़्यादा समझाना नहीं पड़ेगा । तुम सब को तो कल शाम की बिट्टू की हरकत याद है ना । उसने मुझे हराने की कितनी कोशिश की थी । अचपन जी बच्चों से बहुत प्यार करते हैं, तो यह कोई थोड़ी ना है कि हर बात मान लेंगे । तुम लोगों ने कहा कि बरसात में दो दिनों से घर में बंद बैठे है, हमने कहा चलो घुमा लाते हैं । ये तो ठीक था, लेकिन तन्मय जी ने बिट्टू को कुछ सिखा दिया और सब लोग फ़ुस्स फ़ुस्स करते एक दूसरे को, मेरी तरफ धकेलने लगे । मैं भी बच्चूजी सब समझता था, फिर बिट्टू ने फ़रमाईश की, " तन्नू भैय्या कोल्ड ड्रिंक पिलाने को कह रहे हैं, पिलाइये ना अभी । पिलाइये ना अचपन अंकल, पी ..लाई..ऎ, अंकल प्लीज़ पी ..लाई..ऎ । बिट्टू तो जैसे पीछे ही पड़ गयी । मैंने जैसे कुछ सुना ही नहीं, बस आगे एक कोल्ड ड्रिंक की दुकान के आगे बिट्टूजी के पैरों में ब्रेक लग गया, ऊँहुँ ऊँ, पिलाइये पिल्ल्लाः More >
मैंने एक अज़ीब सपना देखा
Jun 14th
जब तक तुम लोग कुछ लिखने का मन पक्का करो, मैं तुम सबसे, खास तौर पर तन्मय से एक सपना शेयर करना चाहता हूँ। कल की रात तन्मय के बारे में सोचते सोचते सोया था, हो सकता है कि यह सपना इसी वजह से आया हो । तुमको जानकर पता नहीं कैसा लगेगा कि मैं इतने कम.. इतने कम.. इतने कम सपने देखता हूँ कि मेरे पास सपनों के बारे में बताने को कुछ खास है ही नहीं । आजकल यहाँ बरसात हो रही है, तो मेंढक भी मेरे लान और पीछे वाले बाग में फुदकने लगे हैं । यह कोई नयी बात थोड़ी ना है ? लेकिन तन्मय जी पूरे दिन इन मेंढकों को परेशान कर के मज़ा लेते रहते हैं, पता नहीं क्यों ?
कभी तो कंकड़ से मार मार कर उसे उछलने को मज़बूर करते हैं, कभी पकड़ कर रस्सी से बाँध कर उसे हवा झुलाते हुये घूमते हैं, जैसे कि कोई बहुत बड़ा शेर मारा हो । बेचारा मेंढक कभी डर से, कभी दर्द से और कभी इधर उधर ठोकर लगते रहने से मर भी जाता है । भाई, मुझको बहुत बहुत खराब लगता है । मैंने तन्मय से कहा भी कि यह तो तुम्हारा More >
पर यह तो बताइये कि ….इससे फ़ायदा ही क्या होगा ?
Jun 4th
अरे भाई, मैं तो आज डरते डरते आया था कि कहीं कोई नाराज़ न बैठा हो, कि आप तो अच्छे गायब हो गये अचपन जी ? तो, मैं क्या ज़वाब दूँगा ? लेकिन यहाँ सब ठीकठाक ही लग रहा है । और फिर नाराज़ तो मुझे होना चाहिये था, बताओ क्यों ?
क्योंकि अबतक केवल, हाँ जी हाँ केवल 6 ईमेल मुझे मिले हैं, जिसमें दो जनों ने अपना ब्लाग बनाना चाहा है, बाकी चार जन ने तो इतने सवाल.. इतने सवाल.. इतने सवाल पूछे हैं कि समझो कि हद खतम हो गयी । लेकिन मैं नाराज़ नहीं हूँ, मुझको को उनका ज़वाब देना ही था सो दे दिया, और उनको हिन्दी में लिखने के आसान रास्ते बताये जा रहे हैं । देखना 5 – 6 वीक में ही तुमको उनका अपना और अपना ब्लाग दिखने लगेगा । यहाँ आरकुट , इन्डिया-राक्स, बिगअड्डा, पाजी, टैग्ड या हाई 5 जैसी बात थोड़े ही है कि आईडी बनाने के बाद इनको इनवाइट करो उसको बुलाओ, फिर जाकर बात बने । फिर मैं तो मदद कर ही रहा हूँ । वैसे मैं एक बात से नाराज़ हूँ कि तुमलोग वहाँ पर जल्दबाजी के चलते एक नयी इंगलिश ले आये हो, अब तुम्हीं देखो ‘ i nvr More >
उनके 98 % और मज़े तुम्हारे, वाह !
May 21st
सुना है कि कल तो तुम लोगों के मज़े आ गये ! शान्तनु भईया के ICSC रिज़ल्ट में 98 % मार्क्स आये हैं, ईषिता बुआ ने भी 92 % बटोर लिये । ठीक तो है, देखा नहीं था लात लात में पल्हते ही लहेते त्थे । यह कौन बोला ? अच्छा तो छटंकी बिट्टू जी हैं ! लेकिन फँस गये मामा जी ! मोहित से शर्त लगाया था कि शान्तनु के 85 से ऊपर नहीं आने वाले, और शान्तनु भईया ने 98 पर तोड़ कर रख दिया । फँस गये बेचारे मामा, उनको पूरी बच्चा पारटी को डिनर देना पड़ा, वह भी कि जो मन हो खाओ।
मामा मामा, मैं तो पिज़्ज़ा के अलावा कुछ भी लाइक नहीं करती, तन्वी इतरा कर बोली । मेघा चिढ़ कर बोली, "जिसने पास्ता खाया होगा, वह कुछ और खा ही नहीं सकता, हुँह पिज़्ज़ाह ! " नहीं नहीं दीदी, आज मैक्सिकन ट्राई किया जाय, बड़ा ट्रेन्डी है आजकल," यह आलोक जी थे। यह हमेशा ट्रॆन्डी के चक्कर में रहते हैं।लगता है, आज तो मामा का हाफ़ फ़्राई बनके रहेगा।
अब तक चुप ईषिता बोली, " यार तुम लोग फ़ूड आइटम्स का वर्ल्ड टूर करो, मैं तो पेटभराऊ इंडियन ही खाऊँगी ।" मारसो ने चुटकी काटी, More >
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती
May 14th
तुम क्या कहते हो ? क्या यह सच नहीं है , तो फिर ? मुझे ऎसे बच्चे भी मिलते है, जो कहते हैं कि अंकल , मैं जैसे तैसे हिन्दी तो बोल लेता हूँ लेकिन लिख तो पाता ही नहीं, बड़ी मुश्किल है, यह हिन्दी ।
एक बात बताओ, तुम्हारे मम्मी पापा की कोई इन्सल्ट करे तो तुम्हें अच्छा लगेगा ? नहीं ना, क्यों ? इसलिये कि वह अपने मम्मी पापा हैं । जैसे भी हैं, बैकवर्ड सोच के देहाती हैं, लेकिन हैं तो मम्मी-पापा ! फिर तुम अपने देश और अपने देश की भाषा की इन्सल्ट कैसे सहते हो ? यह गलत है, अब तो मानोगे ?
ठीक है बाबा, चलो तुमको इंडिया में रहना ही नहीं है । तुम तो यूएसए, यूरोप ही जाओगे, लेकिन अपनी पहचान क्या बताओगे ? इंडियन, है कि नहीं ? मदरटंग के कालम में तुम शायद हिन्दी ही भरोगे, फिर ?
यहाँ आते जाते रहोगे तो तुमको भी यह लैंगुवेज़ अपनी भाषा लगने लगेगी । क्योंकि मेरी पसंद है… यह कविता , जो मैं जबतब दोहराता रहता हूँ । जरा देखूँ तो, मुझे ठीक से याद है भी कि नहीं …
लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती
नन्हीं सी More >


