तुम क्या कहते हो ? क्या यह सच नहीं है , तो फिर ? मुझे ऎसे बच्चे भी मिलते है, जो कहते हैं कि अंकल , मैं जैसे तैसे हिन्दी तो बोल लेता हूँ लेकिन लिख तो पाता ही नहीं, बड़ी मुश्किल है, यह हिन्दी ।

एक बात बताओ, तुम्हारे मम्मी पापा की कोई इन्सल्ट करे तो तुम्हें अच्छा लगेगा ?  नहीं ना, क्यों ? इसलिये कि वह अपने मम्मी पापा हैं । जैसे भी हैं, बैकवर्ड सोच के देहाती हैं, लेकिन हैं तो मम्मी-पापा !  फिर तुम अपने देश और अपने देश की भाषा की इन्सल्ट कैसे सहते हो ?  यह गलत है, अब तो मानोगे ?

ठीक है बाबा, चलो तुमको इंडिया में रहना ही नहीं है । तुम तो यूएसए, यूरोप ही जाओगे, लेकिन अपनी पहचान क्या बताओगे ?  इंडियन, है कि नहीं ?  मदरटंग के कालम में तुम शायद हिन्दी ही भरोगे, फिर ?

यहाँ आते जाते रहोगे तो तुमको भी यह लैंगुवेज़ अपनी भाषा लगने लगेगी । क्योंकि मेरी पसंद है…     यह कविता , जो मैं जबतब दोहराता रहता हूँ । जरा देखूँ तो, मुझे ठीक से याद है भी कि नहीं …

                                                      लहरों पर नौका - अमर

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

नन्हीं चींटी - अमर

नन्हीं सी चींटी जब दाना लेकर चलती है,

चढ़ती दिवारों पर सौ बार फिसलती है ।

मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,

चढ़ कर गिरना गिरकर चढ़ना न अखरता है ।

आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

गोता खोर - अमर

डुबकियाँ सिन्धु में गोताखोर लगाता है,

जा जाकर खाली हाथ लौट आता है ।

मिलते न सहज मोती गहरे पानी में,

बढ़ता दूना उत्साह इसी हैरानी में ।

मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

जयजयकार - अमर

असफलता तो एक चुनौती है, स्वीकार करो’

क्या कमी रह गयी देखो और सुधार करो ।

जबतक न सफल हो नींद चैन की त्यागो तुम,

संघर्षों का मैदान छोड़ मत भागो तुम ।

कुछ किये बिना ही यूँही जयजयकार नहीं होती,

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

 

आज तो एक छोटी शुरुआत है, देखें कि तुम इसको कितना कितना कितना बड़ा बना सकते हो ।            ओके, बाय !