काल-कलौटी..
" निखिल भैआ, आ गये अचपन जी ? " कुछ सुनी-सुनी सी आवाज है, मैं सतर्क होता हूँ ।
दुबारा से " निखिल भैआ, आ गये अचपन जी ? " एक बार फिर दोहराया गया । अरे, ये तो अपना वैभव है, बहुत दिन बाद इनकी आवाज़ सुन रहा हूं । " नहीं बेटा, देखो शायद आज रात तक आ जाये । " बेचारे निराश हो गये, बोले तो कुछ भी नहीं, लेकिन बड़ी अदा से अपने दोनों कंधें नीचे झुका कर झटके,और बेचारगी से हल्की बारिश से गीली हो गई अपनी कामचलताऊ क्रिकेट पिच को देखते रहे । मुझे कौतुक हुआ," क्या बोर हो रहे हो ?" ज़नाब जोधा के अकबर भाई जूनियर ऋतिक रोशन जी ने एक लम्बाऽऽ सा आलाप लिया, " हां ऽऽऽ, हो तो रहे हैं । "
फिर खिसियाहट में पलट कर गुस्से से बोले, " .. और हाप्प भी.. हापने भी तो, " फिर ढेर सारा थूक गटक कर पूरी सावधानी बरतते हुए उल्टे अपना आरोप जड़ डाला, " आपने भी तो इत्ते दिन से कुछ भी मजा नहीं लगाया ! "
जया ने कुछ मान से पीछे से पुकारा, " बउआ आओ चलें.. कोई फायदा थोड़े ही ना है, यह तो जबरदस्ती से हमारे मैच में थर्ड अम्पायर बन कर हमेशा से निखिल भैया को ही जीताते रहते हैं | “ ओफफोह, अपने ही चहेते बच्चे मुझसे इतने नाराज ?
इनको अभी से पिघला लो निट्ठल्ले भाई, वरना यह भी बागी हो जायेंगे । " अच्छा शाम को आना मैं तुमको कुछ नया पढ़वाउंगा और ठंडा भी पिलाऊँगा । क्या पिओगे…………अमूल कूल या मैंगो फूटी ? " लगता है कुछ असर हुआ । दोनों के चेहरों के भाव बदले.." मैंगोऽऽ, अमूल.. आँऽऽ नहीं, ठहरिये बताते हैं, " आच्छा तो अमूल…अमूल कूल ! "
शाम को 5.30 बजे मेरे लौटते ही हाजिर दोनों जन, अब क्या करें ?
अच्छा बताओ, पानी नहीं बरस रहा है, गरमी बढ़ती जा रही है, तुम बच्चों ने पानी बरसाने के लिए क्या किया ? " आहा हा हाय रे, अरे आज सुबह ही तो बलछा है ", वैभव जी को मुझे क्लीन बोल्ड करने का मौका मिल गया जैसे !
जया ने उनके सिर पर हलकी चपत लगायी," हट पागल, कितना कम तो पानी बरसा है । " विकेट रोकने के अंदाज में.., " लेकिन बरसा तो है ना पागल ", पूरी ताकत से वैभव जी नीचे तक झुक कर चिल्लाये, मानो अपील कर रहे हों ।
फिर तो शुरू हो गया, तुम पागल, तुम पागल, तुम पगलेट, तुम महापगलेट तुम सबसे बड़े पग्गलदास, तुम उससे भी बडी पगलेट इंडिया की सबसे बड़ी पगलेट पागल महापागल पूरे वर्ल्ड की सबसे बड़ी, पग्गलदास ! लगता है, अब कुश्ती होने को ही है । वह एक दूसरे पर लपकते, इससे पहले ही मैने उलझा लिया !
देखो पहले जब पानी नहीं बरसता था तो गांव के बच्चे झुंड बना कर हर दरवाजे पर जाते थे, खूब शोर-शराबा करते हुए गाते थे जब तक कि उनके उपर पानी न डाल दिया जाये ।
वैभव जी के आंखें बाहर को आकर उनके टी-शर्ट की पाकेट तक झूल गयी । पहले तो उन्होंनें अपनी शँका का निवारण किया.. " गांव के मतलब विलेज के ? " फिर मुझे खारिज करते हुए बोले, “ हट झूठ झूठ में हमको पागल बना रहे हैं ।”
पर जया थोड़ा सतर्क हुई, " लेकिन अचपन जी इससे क्या होगा ? " मैंनें बात आगे बढ़ाई, " होगा यह कि बच्चे भगवान का रूप होते हैं न, तो जब भगवान उनको परेशान देखते है, तो पानी बरसाते हैं । वैभव तो जैसे चिढ़े हुए है, " धत्त, साँइटिस्ट बरसाते हैं, भगवान कहां पानी बरसाता है ? " देखिये तो वैभव जी फिर गुगली फेंक पड़े और मेरे आउट होने की यानि मेरा ज़वाब जानने की प्रतीक्षा भी न की, और वह पलट पड़े ।
जया डर गई, न जाने काहे से, भगवान के नाराज़ होने से.. या फिर अमूल कूल हाथ से जाते रहने की सँभावना से ? उसने एक चीख लगायी, " बऊआ रुको, भगवान के लिये ऎसा नहीं बोलते । " वैभव थम गये, और वहीं से अपनी हाँक लगायी, " मैंनें.. मैंनें भगवान जी की इन्सल्ट नहीं की, अचपन जी ही तो हमको पागल बना रहे हैं । " उनके नथुने फ़ड़क रहे थे, " बच्चे भगवान होते हैं.. भगवान होते है, तो भला भगवान की पिटाई होती है ? "
लेकिन जया किसी सोच में डूबी हुई थी । लेकिन अचपन जी हमारे मम्मी पापा हमको ऐसा करने ही न देंगे । और.. और तो और कोई पानी भी नहीं डालेगा, बड़ी मुसीबत से तो हमारे लोग का पीने का ही पानी आता है । "
जया समझदार होती जा रही है, वह कुछ आगे जानना चाहती थीं, " अचपन जी इस गेम को क्या कहते है ? " मेरा दिल बैठ गया कि इनको इसे एक टोटका मात्र बतायें या नहीं, अग़र पूछ लिया टोटका क्या होता है, तो ? फिर तो मैंनें ज़ल्दी से बात खत्म कर देनी चाही, " काल-कलौटी.. यह देखो फोटो ! "
यह.. यह सच्ची के हैं ? वह उत्तेजित हो गयी, यहऽऽ, यह यह्ह, फोटो हमको कापी करके दे दीजिये । मुझे लगा कि उसकी नजर अमूल कूल के पैकेट पर भी थी ।
ठीक है दे दूंगा, यह वैभव का पैक भी लेते जाओ।
वह जाते जाते एकदम से ठहर गयी," अचपन जी, आपने यह तो बताया नहीं कि यह बच्चे " बरसो से मेघा रे, बरसो रे मेघा मेघा बरसो, बरसो रे मेघा बरसो.. धिन्ना रे धिन्ना रे " गाते थे, या और कुछ और ? " वह भी थोड़ा सा गुनगुना कर अपने को जैसे तौलने लगी ।
वह तो शायद यही गाते थे कि..
काले मेघा पानी दे
गगरी छूछी, बैल पियासे
गौ-गौवन को पानी दे
काले मेघा पानी दे, पानी दे गुड़ धानी दे
काले मेघा पानी दे,काले मेघा पानी दे,
बरसे जा.. बरसाये जा, बदरा झड़ी लगाये जा
बरसो राम धड़ाके से, तुम्बी भर दो आटे से
| Print article | This entry was posted by अचपन जी on July 1, 2009 at 5:43 am, and is filed under तुम्हारे सवाल, तुम्हें मालूम है... Follow any responses to this post through RSS 2.0. You can leave a response or trackback from your own site. |



about 2 years ago
खेल सफल हो गया अचपन जी .रात से बदल आकर खिड़की पे चिल्ला रहे है ..की दरवाजे बंद कर लो…बच्चो को हमारी ओर से शुक्रिया कह देना…वैसे ताज्जुब की बात है की न की २००९ में भी हम कुदरत के भरोसे यूँ बैठे हुंए है….आने वाली पीढियों को क्या मिलेगा ….सब कुछ दोहन ओर ख़त्म करने पर हम तुले है…
about 2 years ago
राम खूब धड़ाके से बरस रहे हैं कल तो ऐसा लगा जैसा बादल फ़ट गया हो ! सब भर दिया ! बहुत मज़ा आया !
about 2 years ago
बहुत ही बढिया ……………..सुन्दर लेख
about 2 years ago
बहुत सुंदर आलेख! आपने सब को अपने बचपन में पहुँचा दिया।
about 2 years ago
सुँदर मेघ की कविता याद आ गयी है -
बच्चे खुशहाल रहेँ -
देस आबाद रहे –
यही प्रार्थना है
- लावण्या
about 2 years ago
बारिश के लिए क्या कुछ !